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Saturday, 16 January 2010

कौन जीतेगा ऑस्ट्रलियन ओपन










यह एक ऐसी तस्वीर जो शायद ही कोई फेडरेर का टेनिस फेन अपने मस्तिषक से निकाल पायेगा. यह तस्वीर है २००९ के ऑस्ट्रलियन  ओपन के पश्चात की. फेडरेर की लाख कोशिशों के बावजूद भी वो मैच जितने में नाकाम रहे है और सेहरा बंधा उस समय के चढ़ते   हुए सितारे राफेल नदाल के नाम.

इस सोमवार से ऑस्ट्रलियन ओपन २०१० शुरू होने वाला है और इसके प्रबल दावेदारों में फेडरेर, एंडी मुर्रे, नदाल एवं डेल पुत्रों का नाम सर्वोच्च है. नोवाक दोजोकोविक के जीतने के आसार  कम है क्यूंकि  उनकी २०१० की शुरुआत बड़ी ही सामान्य तरीके से हुई है. पुरुषों का टेनिस कभी भी इतना रोचक  नहीं रहा जितना की वो   आज है. फेडरेर भले ही  नंबर  १ के पायदान पर विराजमान है किन्तु उनको चुनौती   देने के लिए पीछे एक पूरा जत्था  त्यार  खड़ा है जिसमे नोवाक, मुर्रे एवं डेल पुत्रों  सम्मिलित है.

चलिए अब नज़र डालते है इस साल के दावेदारों पर वैसे तो फेडरेर सटोरियों के पसंदीदा है परन्तु जिस प्रकार से उनकी फॉर्म चल रही है उनका विजेता बनाना थोडा मुश्किल लग रहा है. नदाल  की हालत भी कुछ बढ़िया नहीं है क्यूंकि  उन्होंने पिछले अप्रैल से किसी भी पहले दस वरीयता प्राप्त खिलाडी को नहीं हराया है. नोवाक पिछले साल के अंत में अच्छा खेले पर २०१० में उनका प्रदर्शन लचर रहा है इसलिए उनसे ज्यादा उम्मीद रखना समझदारी नहीं है.

डेल पुत्रों ने बराबर विश्राम लिया है और वो साबित कर चुके है की वो ग्रां सलाम जीत सकते है. एंडी मुर्रे मेरी नज़र में फेडरेर के ताज के सबसे प्रबल  दावेदार है परन्तु लापरवाही के चलते अब तक ऐसा करने में असफल  रहे है. छुपे रुस्तोम के श्रेणी में मेरे विचार से सोडरलिंग एवं मरीन सिलिच के काफी आसार है.

तो देखिया क्या होता है, इस सोमवार से प्रतियोगिता शुरू है, देखिएगा अवश्य...

Wednesday, 5 August 2009

स्वयंवर एक भ्रम


स्वयंवर शब्द का अर्थ देखेने जायेंगे तो अपना दूल्हा के चुनाव अपने आप। परन्तु क्या ऐसा था? राखी के स्वयंवर देखने वालो का कहना है की हिंदू धरम में स्त्री को अपना वर चुनने का अधिकार था। इसमे मेरे विचार में कुछ ज्यादा सत्यता नज़र नही आती है क्यूंकि मोटे तौर पर मुझे दो स्वयंवर के विषय में ज्ञान है- एक सीता जी का और दूसरा द्रौपदी का।

दोनों ही मेरे दृष्टिकोण से नारी अधिकारों या समानता की झलक कम और एक प्रतियोगिता होने का आभास ज्यादा दिलाती है। पहले में श्रीराम धनुष की प्रत्यंचा चढा कर विवाह करने का अधिकार प्राप्त करते है और दूसरे में अर्जुन जल में देख निशाना लगा कर। मेरे विचार से तो भारतीय समाज हमेशा से पुरूष प्रधान रह है अभी कुछ ज्यादा बदलाव नही आए है चाहे राखी के चाहने वाले कुछ भी कहते रहे।

अंत में महा घटिया सीरियल था और उस वर को सिर्फ़ गुड लुक्क कहना चाहूँगा जिसने अपने पो में कुल्हाडी मार ली है!

Friday, 10 July 2009

भारतीय रेल लखनऊ से बॉम्बे -2

लूका ने हमरा काफ़ी गरम जोशी से स्वागत किया और घोषित कर दिया की अब वो हमारा official गाइड है। लूका हमसे पहले बॉम्बे आ चुका था और यहाँ के बारे में काफ़ी कुछ जानता भी था।


"भाई लोग, एक बात बता देता हूँ, अक्खा मुंबई वडा पाँव खा के जिन्दा रहता है, इस शहर में अमीर से अमीर और गरीब से गरीब मज़े से रह सकता है "।
मेरे लिए यह सब स्वपन सा प्रतीत हो रह था और मैं मंत्रमुग्ध सा लूका का प्रवचन सुन रिया था।

लूका ने हमारे रूकने का इन्तेजाम ग्रांट रोड में किया था और कह रह था- मैं तुम्हे यहाँ इसलिए रूका रहा क्यूंकि यह जगह टाऊन से बेहद करीब है। बड़ा ही घटिया होटल थी और हम सब एक बेड का १०० रु रात्रि दे रहे थे। उस समय हमे मालूम नही था की ग्रांट रोड बम्बई के सबसे बदनाम इलाको में से एक था, लेकिन रात ढलते ही हमे इस बात का कुछ कुछ आभास सा होने लगा था.....


अबे राका यहाँ की सड़के देखो, कितनी चिकनी है!! साला लखनऊ में हो तो आदमी सो जाए...

लोकल ट्रेन में बैठे तो बावले ही हो गए और डंडो से लटक लटक एक जगह से दूसरी जगह बंदरो कीतरह उछाल कूद मचने लगे।
बॉम्बे की पहली रात ऐसा प्रतीत हो रहा था की कभी ख़तम ही नही होगी, हम लोग मालाबार हिल से चोपाती, फिर गेटवे ऑफ़ इंडिया फिर कही और फिर कही....,

लूका ने हमारे लिए एक दो जगह बात चला कर राखी हुई थी। अगली सुबह हम एम्बेसडर होटल पहुँच गए। वह पहुंचे तो मैं अपना resume होटल ही भूल आया था और मुझे लगा की अब सब गुड़गोबर क्यूंकि उस दिन जमा करने की आखरी तारीख थी। मैं डरते डरते ट्रेनिंग मेनेजर के ऑफिस गया। वह एक साफ़ रंग की साधारण से नाक नक्श की आकर्षक महिला थी, मुझे वो पहली ही नज़र में भा गई। पर उस से क्या, मुझे तो हर सुंदर लड़की भाती थी, उन्हें मैं नही भाता था। परन्तु वह क्षण मेरी जिंदगी का turning पॉइंट साबित हुआ। जेस्सी नाम ता उसका, वह बोली- तुम अपना resume परसों ले आना.

राका मेरे साथ आया था, पर वह कभी भी इन चीजों के लेकर गंभीर नही रहा। सांगा और नथू को विदेश जाने का चस्का था इसलिए वो एक एजेंट के चक्कर में बोरी बन्दर के चक्कर पे चक्कर काट रहे थे।

मेरे सितारे बुलंदी पर थे, मैंने स्क्रीनिंग टेस्ट पास किया, फिर सामूहिक विवाद में सबके छक्के छुडा दिए और अन्तिम सूचि में आ गया। परिणाम घोषित २ हफ्तों के पश्चात होना था इसलिए वह से निकले और वडा पाव भास्काया (हम तो गरीबो की श्रेणी में ही थे) और नये ठिकाने की तलाश में निकल पड़े।

मम्मी ने एक ताऊ जी का फ़ोन नो दिया था, सोचा किस्मत आजमा लू। फ़ोन किया तो उन्होंने पहचान लिया और अपने घर पर रूकने का आमंत्रण दे दिया। अभी आगे गोवा भी जाना था इसलिए कम से कम पैसो में गुजरा करना था। मैं और राका बोरिया बिस्तर ले ताऊ की पास जा धमके. सांगा और नथू , लूका के पास जा कर रहने लगे।

मेरे लिए यह आखरी अवसर था और मैं इसे व्यर्थ नही करना चाहता था। हम दोनों ने रात देर तक होटल लीला के interview की तयारी करी और भोर की प्रतीक्षा करने लगे।


एक है अनार और सो है बीमार!! लड़के लड़कियों की भीड़ आई हुई थी वह पर। मुझसे कहा गया आपको मीठा व्यंजन बनाना होगा। मैंने शेफ कोट डाला और pastry डिपार्टमेन्ट जा कर अपने हुनर को अंजाम देने की कोशिश में लग गया। इतना घटिया बनाया की मुझे उस दिन ही ज्ञात हो गया था की चाहे सूरज पश्चिम से उग आए, मैं चुना नही जओंगा।

लीला वाले बड़े ही हरामी थे, पूरा दिन हमसे काम कराया और चाय के लिए भी नही पुछा।

दिन के तीन बज चुके थे और हमारे भूख के मारे बुरे हाल थे। हम लोग अँधेरी स्टेशन की तरफ़ चलने लगे, बीच में एक चाय की दुकान आई थो सोचा कुछ नाश्ता कर लिया जाए।

-भइया २ चाय और २ प्लेट पकोडे देना।
-पकोडे नही है।
-हैं, तो वो बहार टोकरी में क्या रखे हो?
- वो!। वो तो भजिया है।


मेरी जान में जान आई, हमने कहा - हा भाई वही, हम लोग इसे पकोडा बोलते है।

बॉम्बे का पडाव अपने अन्तिम चरण पर था, जॉब hunting के लिए अगला शहर tourism कैपिटल ऑफ़ इंडिया यानि की गोवा.............

Sunday, 21 June 2009

पाकिस्तान की जीत में धोनी को सन्देश


आखिरकार पाकिस्तान विजेता बन ही गया. यह एक ऐसा परिणाम है जिसकी काफी सारे लोगो को अपेक्षा नहीं थी. शायद ऐसा प्रतीत होता है की जैसे यही नियति थी. पिछली बार भारत ने पाकिस्तान को हरा कर यह कप जीता था और इस बार भारत की टीम प्रतियोगिता जीतने की प्रबल दावेदारों में से एक थी परन्तु कैप्टेन धोनी एवं टीम प्रभंदन के कुछ गलत फैसलों के कारण वो इश्वास को हकीकत में बदलने में असफल रहे.


पक्सितन की टीम का तरोताजा होना और यूनिस खान की कप्तानी का सही समय पर चलना उनके लिए सबसे भाग्यशाली साबित हुए. वही दूसरी तरफ भारत का जडेजा पर जरूरत से आताम्विश्वास घातक साबित हुआ. मेरे विचार में धोनी को युसूफ को उसी तरीके से प्रयोग में लाना चाहिए था जिस तरह अफरीदी को पाकिस्तान ने.
भारत की तरफ से एक और गलती यह हुई की टीम में स्ट्राइक बॉलर का न होना. अपने किसी भी मैच में भारत की टीम अपने प्रातिदवन्दियों को अल आउट करने में विफल रही है और पाकिस्तान के ३ गेंदबाज प्रतियोगिता के ३ सफलतम में से रहे. धोनी का ओझा को टीम से ड्राप करना सुरक्षात्मक निति का संकेत था और शायद इसी का खामियाजा भुगतना पड़ा.
अब तो यही आशा की जा सकती है की धोनी एवं टीम प्रभंधन अपनी गलतियों से सबक ले और अगले साल होने वाले कप की तयारी में जुट जाए.

Sunday, 14 June 2009

चक दे इंडिया (महिला क्रिकेट)

आजकल इंग्लैंड में महिला क्रिकेट का आयोजन चल रह हैऐसा पहली बार हो रहा है की पुरुषों और महिला प्रतिस्पर्धा साथ साथ आयोजित की गयी हैहमारा समाज चाहे वो पश्चिम या पूरब हो, खेल प्रतिस्पर्धाओं में अभी भी पुरूष प्रधानता का डंका बजता हैइक्के दुक्के क्रीडाओं को छोड़ दिया जाए तो महिला एवं पुरूष खेलो के प्रचार और प्रसारण में जमीन आसमान का अन्तर हैपरन्तु अब ऐसा प्रतीत होने लगा है की अब समय गया है इस भ्रान्ति और पक्षपात पूर्ण रवैये को दूर करने काइसी के चलते हमारी मित्र मंडली ने यह निश्चय किया की १३ जून को होने वाले भारत पाकिस्तान के मुकाबले में महिलाओं का हौंसला बढ़ाने के लिए हम taunton जायेंगे


विश्व कप के इतिहास में अब तक पाकिस्तान भारत को हराने में असफल रहा है और पाकिस्तान के टीम अपना पहला मैच श्री लंका से हार भी चुकी हैभारत भी अपना पहला मैच इंग्लैंड से १० विकेट से हार गया थे, परन्तु भारतीय क्रिकेट टीम में जुझारू खिलाड़ी है और झूलन गोस्वामी इस समय की सबसे तेज गेंदबाज मानि जाती हैमिताली राज के नाम टेस्ट मैच में दोहरा शतक लगाने का कीर्तिमान है और अंजुम चोपडा अपने तकनिकी सुदृढ़ता के लिए जानी जाती है और उनकी तुलना डेविड गोवेर से की जाती है


मैच की शुरुआत में ही भारत ने पाकिस्तान पर अपना दबदबा बना लिया और उनके पाँच विकेट सस्ते में निकाल दियाप्रियंका रोय ने शानडर
बोलिंग करते हुए पाकिस्तान के पांच विकेट निकाल कर पूरी टीम को सिर्फ ७५ रनों पर आउट कर दिया. भारत की बल्लेबाजी की शुरुआत अच्छी नहीं हुई और पूनम राउर पहले ही ओवर में रन आउट हो गयी. भारत ने भी अपने पहले ३ विकेट सस्ते में गँवा दिए परन्तु उसके पश्चात अंजुम चोपडा ने एक जिम्मेदार पारी खेलते हुए भारतीय टीम यानि की चक दे गिर्ल्स की नय्या पार लगाये और सेमी finals तक पहुँचने का रास्ता सरल बना दिया.

महिला क्रिकेट धीरे धीरे प्रसिद्दि प्राप्त कर रह है और वो दिन दूर नहीं, जब महिलाओं के मुकाबले भी उतने ही चाव से देखे जायेंगे जैसे की पुरुष क्रिकेट के.

Friday, 15 May 2009

IPL का बुखार

हमारे नविन तोगडिया साब को सचिन तेंदुलकर से allergy है। उसका कारण शायद यह है की एक बार वह मुंबई गए थे और लोकल ट्रेन में उन्हें सचिन मिला और सचिन ने उन्हें बैठने के लिए जगह नही दी। तोगडिया साब का एक ही एजेंडा है की सचिन की ली जाए, उन्हें और खिलाडी क्या कर रहे है, इस से कोई मतलब नहीं होता है। इनका भी modus operandi बड़ा ही सीधा और सरल है। यह तब कुछ नही कहते है जब सचिन की टीम जीतती है पर जहाँ टीम हारी, वहां सचिन की वाट लगा दी जाती है।

तोगडिया जी का कहना है की सचिन choker है और तनाव की स्तिथि में खेल नहीं पाता है। अगर एक खिलाडी लगातार अच्छा खेलता रहे और कभी तनाव में न आए और हमेशा रन बनता रहे, मेरे हिसाब से तो यह सम्भव ही नहीं है। कौन चोक नहीं करता है, क्या पोंटिंग चोक नहीं हुआ, जब स्टीव वॉघ अपने last frontier पर था तो पोंटिंग बुरी तरीके से असफल रह था और पाँच बार भज्जी का शिकार बना था। आप किसी भी खिलाड़ी को ले और हर कोई तनाव का शिकार होता है, मुद्दा यह है की तोगडिया जी की आलोचना पूर्णत एकतरफा है। युराज सिंह ने पिछले t20 में बेहतरीन प्रदर्शन किया था लेकिन इस tournament में कुछ matches में वो भी चोक कर गया। chennai के साथ के मैच में shane warne ने shane harwood को bowling दे कर गलती करी और वो मैच हार गए, पर मुंबई की साथ मैच में warne सचिन पर हावी रहे और उसे out करने में भी सफल भी रहे। warne भी एक legend है और सचिन और warne में से एक ही खिलाड़ी की जीत सम्भव थी।

मुझे तो t20 game बहुत अच्छा लग रह है, इस में रोमांच है और खिलाड़ी हमेशा रन बनाने की सोचते है, game high tempo है और एक captain पर बहुत निर्भर करता है की टीम कैसा प्रदर्शन करेगी ।

चलिए एक नज़र डालते है, teams और उनके captians पर।
मेरी पसंदीदा टीम है दिल्ली, उसका कारण है ashish nehra, क्रिकेट जगत में अपने नरम सवभाव के लिए जाने वाले नेहरा साब दिल्ली की मधुर भाषा का प्रयोग करने में नहीं चुंकते है, इन्ही के देखा देखी दिल्ली के सारे bowlers नियम से जब भी किसी खिलाड़ी को आउट करते है तो उसको banjo बोल कर विदा करते है। नेहरा साब की मधुर भाषा का नमूना youtube में उपलब्ध है। पिछले मैच में रजत भाटिया को सिटी moment ऑफ़ success (banjo) चार बार bolne के लिए मन ऑफ़ दे मैच दिया गया था।

मेरी दूसरी fav टीम है knight riders, वो इसलिए की fakeiplplayer इनकी टीम का सदस्य है। यह जीतने के लिए खेलते ही नहीं है और इन पर मैच fixing का आरोप भी है। आईआईएम वालो ने इनसे अनुमति ली है की अगर वे लोग knight riders का केस अपने अपने संसथान में पढ़ा सकते है - फॉर the worst managed टीम

मुंबई इन्दिअन्स मुझे इसलिए पसंद है की क्योंकि मेरे पसंदीदा सचिन जी इस टीम के कैप्टेन है। और दूसरा कारण की इस टीम में कोई आस्ट्रेलियन नही है।

इसके बाद पंजाब , और मेरे पसंदीदा कलाकार माफ़ कीजियेगा खिलाड़ी संथाकुमार श्रीसंथ इसी टीम में खलेते है। मुझे इस बात का बहुत अचम्भा होता की कोई आदमी मार खाने के बाद भी क्यों नही सुधरता है। ऐसा लगता है युवराज और श्रीसंथ की घनिस्थ मित्रता है, तभी इतनी पिटाई होने के बावजूद भी team में बने हुए है। सबसे खेद की बात तो यह है की इनकी पिटाई हेडेन और सयमोंड्स ने करी।

shane warne युवा भारतीय खिलाड़ियों के लिए वरदान saabit हो रहे है, कोलकत्ता वालो को इनसे सीखना चाहिए की युवाओ की प्रतिभा को कैसे निखारा जाता है।कल एक commentator कह रह था की यहाँ पर कोई मैच विन्नेर नही है और सारे matches last over में ही जीते गए है। इसमे shane warne की ही दाद देनी पड़ेगी पर टीम में कुछ आधारभूत खामिया है। खासकर जब यह दूसरी बार बैटिंग करने आते है।

deccan में मुझे adam gilchrist ही पसंद है और अब तक के प्रदर्शन से यह जाहिर है की टीम ने खूब अभ्यास और महनत करी है। इस टीम में भी भारत के लिए युवा सितारे तेयार हो रहे है। पर में नहीं कहूंगा की यह जीते क्योंकि symonds इस टीम के लिए खेलता है और कोई भी टीम जिस में symonds हो उसे support करना एक हिन्दुस्तानी के लिए पाप है।

बंगलोर tournament की सबसे ज्यादा unprdictable टीम में से है, यह बड़े अन्तर से मैच हारते है पर सारी मजबूत टीम को इन लोगो ने हराया है। इस टीम के जीतने के चांसेस इसलिये भी कम है क्योंकि यह सिर्फ़ तीन या चार बल्लेबाजो के साथ खेल रहे है। कुछ baggage इस टीम के साथ चल रहा है।

chennai सबसे संतुलित टीम लग रही है पर तोगडिया साब के हिसाब से यह भी choker है क्योंकि chase करने में इनका रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। पर अगर यह पहले batting करते है तो सबसे ज्यादा विस्फोटक बल्लेबाजी इसी टीम के पास ही है। धोनी, दादा का सही मायने में उतराधिकारी है पर इस टीम को नापसंद करने की वजह एक ही है matthew hayden.





Wednesday, 1 April 2009

गधा घोड़ा प्रधानमंत्री

भाग्य बड़ा ही बलवान है, इस बात को सच करता है भारत का लोकतंत्र। वैसे तो चोपाल गांव में लगती है पर कभी कभी या फिर अक्सर ट्रेन के डब्बों में भी लगती है। एक बार मैं और राका दिल्ली से इंटरव्यू देकर वापस लखनऊ आ रहे थे। हमने दो बजे वाली गोमती पकडी और अपनी अपनी सीट पर बैठ कर यात्रा का आनंद लेने लगे। मैं भारत के काफी हिस्सों मैं रह चुका हूँ और काफी जगह घूम कर भी आया। मैंने और शायद काफी लोगो ने इस बात को महसूस किया होगा की उत्तर प्रदेश के लोग राजनीती में ज्यादा दिलचस्पी लेते है।


यह बात है, जब हमारे देश के देवगौडा जी थे, हुआ यू की मैं और राका तो एक दूसरे के face करते हुए साइड की सीटो पर बैठे थे और बाकि की छेह सीटो पर दोस्तों की एक मण्डली बैठी हुई थी। ऐसी ही कुछ बात हुई तो एक सज्जन बोले --- भई हमारे देश मैं प्रधानमंत्री बनना कोई बड़ी बात नहीं है, यहाँ तो कोई भी गधा घोड़ा प्रधानमंत्री बन जाता है.

उन सज्जन ने वो बात जो भी सोच कर कही होगी लेकिन कही बहुत सटीक और ऐसी सटीक की हमारे प्रजातंत्र का कच्चा चिटठा खोल कर रख देती है। और वैसे भी देखा जाए तो राजीव गाँधी जी के बाद अटल जी ही एक ऐसे प्रधानमंत्री है हो सही मायने मैं उस पद के अधिकारी थे।


देवगौडा जी का pm बनना किसी joke से कम नहीं था औए उस से भी बड़ा दुर्भाग्यशाली था चन्द्रसेखर जी का गद्दी पर विराजमान होना। ऐसा शायद ही किसी और लोकतंत्र मैं सम्भव होगा की ५ प्रतिशत सीटे होने के बावजूद भी उन्हें गद्दी पर बिठा दिया गया। वि प्र सिंह जी को जिस विस्वास से लोगो ने गद्दी सौंपी थी, उन्होंने उसी पर कुठाराघात कर देश को मंडल और कमंडल के बीच मैं बाँट दिया।

यह राजनीती इतनी भ्रष्ट होती जा रही है की अब तो डर लगता है की सुश्री मायावती कही देश के बागडोर न सम्भाल ले, अगर ऐसा होता है, इस से बड़ा दुर्भाग्य देश का न hooga

Tuesday, 31 March 2009

दही मुर्ग मसाला

दही मुर्ग

सामग्री:

मुर्गा -१ किलो, प्याज़ - ३, अदरक-३० ग्राम, लहसुन- ३० ग्राम, हरी मिर्च-४, लाल मिर्च - ५ ग्राम, जीरा पाउडर-५ ग्राम, धनिया पाउडर- ५ ग्राम, हल्दी- ५ ग्राम, साबुत जीरा - २ ग्राम, एलिअची-२ , तेज पता -२, लौंग- ४,
दही- १२० ग्राम, नमक स्वादानुसार


विधि : नीचे दिया गए विडियो मैं विस्तार से बतलाई है





Monday, 30 March 2009

यमक अलंकार और राका


राका उर्फ़ राकेश तिवारी मेरे परम मित्रो में से हैं. हमारी मित्रता इनसे तब हुई जब हम खाद्य प्रबंधन मैं लखनऊ से उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. मैंने उच्च शिक्षा इसलिए कहा क्योंकि यह हमने अपनी बारहवी जमात पास करने के पश्चात किया.


लखनऊ की अपनी एक पहचान और यूँ कह लीजिए की एक चरित्र है. वहां के लोगो मैं एक ख़ास तहजीब, बात करने का एक ख़ास अंदाज़ और खाने पीने की बहार है.

जब मैं कॉलेज मैं पढ़ रह था तो मैं अपने दल के लड़को में चरसी के नाम से प्रसिद्ध था, अब चरसी का मतलब यह नहीं है की मैं चरस पीता था बल्कि यहाँ पर चरस का मतलब दूसरो का दिमाग चाटने से हैं. अब मुझे यह तो नहीं मालूम की इस शब्द की उत्पति कैसी और कहाँ हुई पर यह जरूर मालूम है की तीन साल IHM में मैं चरसी no 1 के नाम से जाना गया.


खैर ये तो हुई पुरानी बात, हमारी मित्रता को बारह साल हो गए है और अब भी यथावत बनी हुई है. जब भी मेरा किसी का दिमाग चटने या फिर चरस करने का मूड होता है तो मैं राका को फ़ोन कर लेता हूँ और अपने मन की इच्छाओं की पूर्ती कर लेता हूँ. अभी कुछ ही दिन पहले की बात है की मेरे मस्तिषक मैं कोतुहल जगा की यमक अलंकार के बारे मैं शोध किया जाए.

मेरे स्वर्गीय पिताजी हिंदी के अच्छे ज्ञाता थे और उन्हें कविराज भूषण की कविताएँ बहुत प्रिय थी. वो दो कविताओं का प्रसंग बार बार छेड़ते थे, पहली- इन्द्र जिमी जम पर .....और दूसरी - एल खेल बैल फैल.... यह जो कविताएँ हैं यह हिंदी के अलंकारों के समझने के लिए अति उपयुक्त है, खासकर के यमक अलंकार. जो लोग यमक अलंकार से परीचित है, उन्हें ज्ञात होगा की इस अलंकार मैं एक जैसे वाक्यों के दुआर्थ होते है. उदाहारण के लिए दादा कोंडके के द्वारा निर्मित अधिकाँश फिल्में, "अँधेरी रात में दिया तेरे हाथ में" या डेविड धवन और गोविंदा के फिल्मों के संवाद.

हमने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए और राका जी के ज्ञान चक्षु खोलने के लिए फ़ोन लगाया और पुछा...... " हा भाई जानते हो यमक अलंकार क्या होता है" तो जवाब आया - हा वही न जिसमे एक ही अक्षर बार बार आता है जैसे चंदू के चाचा ............ blah blah blah blah ।

अर्थात राका इस से तथ्य से पूरी तरह से अनभिज्ञ था लेकिन स्वीकार नहीं करना चाहता था. हम ने भी कच्ची गोलिया नहीं खेली , हमने भी राका तो भूषण जी की कविता सुनाई और बतलाया की तीन बेर खाती थी और तीन बेर खाती हैं में यमक अलंकार है, क्योंकि दोनों वाक्यों के अलग अलग अर्थ है. साथ साथ हमने उन्हें इस बात से परीचित karaya ki आजकल हम ब्लॉग लिख रहे है और हमारे ब्लॉग का नाम आतम मंथन है।

राका को मेरी इस तरह की बात बहुत पकाऊ लगती है इसलिए वो मुझे बात बात में चरसी बुलाता रहता है. बात आई गयी हो गई. राका ने एक दो बार ब्लॉग पढने की कोशिश भी करी, पर उनके बस का नहीं है, इसलिए पूरा पढ़ नहीं पाए.

आजकल मेरी श्रीमती जी अपने मायके गई हुई, और राका को पता है की जब वो यहाँ नहीं होती है तो मेरे पास अपनी उदर पूर्ती करने के लिए रामबाण है जिसका नाम है maggi नूडल्स..राका को आत्म मंथन का मतलब तो मालूम नहीं चला पर उस से मिलता जुलते एक शब्द के बारे में उन्हें अच्छे से ज्ञान है. तो आजकल जब उनसे बात होती है तो उनका एक ही तकियाकलाम है......गौरव आत्म मंथन करो, maggi खाओ और सो जाओ.

Sunday, 29 March 2009

शाहरुख़ मेरे दृष्टिकोण से......


भारत का सुपरस्टार शाहरुख़ खान.... १९८८ मैं दूरदर्शन पर एक सीरियल आया करता था जिसका नाम था फौजी। हर बुधवार की रात सांय ८ बजे उसका प्रसारण होता था। मैं उस समय आठवी कक्षा मैं पढ़ रह था। उन दिनों मैं जल्दी सोने चला जाता था, क्योंकि सुबह स्कूल जल्दी जाना होता था। मुझे याद है की उस सीरियल मैं एक chracter  था जिसका तकियाकलाम था ... I say chaps.. वो कलाकार कहाँ गया किसी को नहीं मालूम, पर उसी सीरियल मैं एक बहुत साधारण सा दिखने वाला एक लड़का था- शाहरुख़, जोकि आगे चलकर किंग खान बना।

मैं टेलिविज़न का शुरू से ही बहुत शौकीन रहा हूँ। मुझे अब भी याद है जब हमारा पहला टेलिविज़न आया था, हम लोग शाम सात बजे से टीवी देखना शुरू कर देते थे और कृषि दर्शन जैसे कार्यक्रम जोकि हमारे पल्ले बिल्कुल भी नहीं पढ़ते थे, उन्हें भी बड़े चाव से देखते थे। वैसे भी हमारा देश एक कृषि प्रधान देश हैं और हम सब को कृषि दर्शन देखना अनिवार्य होना चाहिए ।

चलिए वापस आते है शाहरुख़ किंग खान पर, वो भी मेरे नजरिये से..... सच कहूं तो मुझे शाहरुख़ कुछ ख़ास नहीं लगा था, और एक साल तक शाहरुख़ का कुछ आता पता भी नहीं लगा। उसके बाद एक और सीरियल आया जिसका नाम थे सर्कस। मुझे वो सीरियल कुछ ख़ास पसंद नहीं था, और ना ही मुझे यह समझ आता था, की सब लोग शाहरुख़ को इतना चढा क्यों रहे थे। खैर जो भी हैं, शाहरुख़ को पहचान उसी सीरियल से मिली और शायद पहली फ़िल्म भी, शायद दीवाना। बहुत से लोगो के नहीं मालूम है की शाहरुख़ ने दीपा साही के साथ एक सीरियल किया था जिसका नाम था .....IDIOT -अहमक...... उस सीरियल मैं मुझे शाहरुख़ की एक्टिंग अच्छी लगी थी।

उसके बाद मैंने जब दसवी कक्षा पास करी तो, सिनेमा हाल मैं पिक्चर लगी थी जिसका नाम था ....बाजीगर। उन दिनों फिल्मों की मार्केट खस्ता हाल ही थी, और फिल्म ज्यादा पिट ही रही थी। मैं अपने दोस्तों के साथ सिटी हाल मैं गया। और मुझे फ़िल्म वाकई अच्छी लगी, तब मुझे जरूर लगा की यह हीरो चलेगा। मेरे ख्याल मैं किसी भी हीरो का चलना इस पर बहुत निर्भर करता है की .....क्या वो हमारे ही जैसा है या नहीं ? यह तो सब जानते है की फिल्म समाज का दर्पण होती हैं। हम फिल्मों मैं वही सब कुछ देखना चाहते है जो हम अपनी निजी ज़िन्दगी के साथ मैच कर सके। शाहरुख़ मेरी नज़र मैं बहुत हद तक उस छवि पर उतरता था - next door neighbour वाली।

उसके पश्चात मुझे याद है तो वह है - तुझे देखा तो यह जाना सनम,.... मेरे ख़याल मैं यह वही गाना था जिसने शाहरुख़ का नाम बच्चे बच्चे की जुबान पे चढा दिया। तब तक मैं कॉलेज मैं आ चुका था और मेरे भी दिल मैं प्यार की पींगे बढ़ने लगी थी। मैंने कभी दिलवाले पूरी तो नहीं देखी, पर मुझे गाना पसंद आया था। उसके बाद मैं औरंगाबाद नौकरी के लिए चला गया। १९९८ मैं कुछ कुछ होता है रिलीज़ हुई, मैं अपने सहकर्मियों के साथ वो फ़िल्म देखने गया था। सारी स्त्रियों को वो फ़िल्म अत्यधिक पसंद आई, पर मुझे तो ठीक ठाक ही लगी।

मेरी नज़र मैं आमिर हमेशा ही एक पूर्ण कलाकार रहा है और उसके अभिनय मैं ज्यादा विविधता भी हैं। लेकिन वक़त गुजरता रहता है और फिल्म भी आती रहती हैं। एक बार मैं हमारे एक जानने वाले जो देहरादून मैं रहते है, उनके घर गया। वहां मैं और बोनी  .... कभी खुशी कभी ग़म देखने लगे। वो पिक्चर फुल एंड फुल मनोरंजन थी, power packed performance। . उस दिन मुझे पहली बार शाहरुख़ के अभिनय मैं कुछ ख़ास लगा, खासकर के उसकी कॉमेडी।
२००३ मैं इंग्लैंड आ गया। हम भारतीय फिल्म देखने और उसके बारे मैं विचार विमर्श करने मैं अपना अच्छा खासा समय व्यतीत करते हैं। विदेश मैं रह कर हिन्दी फिल्में अपने देश से जुड़े रहने एक अच्छा माध्यम हैं। इसलिए जब कल हो न हो रिलीज़ हुई तो हमने फटाफट देख डाली। फ़िल्म अच्छी थी और मनोरंजन से भरपूर थी और किंग खान की अदाकारी काबिले तारीफ़। मैं भले ही किंग खान का कट्टर प्रशंशक नहीं था पर कायल जरूर हो गया।

क्योंकि मैं शाहरुख़ की सारी फिल्में नहीं देखता हूँ, इसलिए उसके बाद मुझे चक दे इंडिया की ही याद हैं। फिल्में सिर्फ़ अच्छे अभिनय या कहानी के दम पर ही नहीं चलती हैं, हित होने के लिए पूरा पैकेज चाहिए। चक दे बहुत ही अच्छी फ़िल्म थी और मैं काफी हद तक भावुक भी हो गया था।

अंत मैं यही कहूँगा, शारुख हमारी पीढी के बेहतरीन अद्कारो में से है। मेर पसंदीदा तो आमिर ही है, लेकिन शारुख के अभिनय में भरपूर मनोरंजन है। वो कहते है ना by the people, for the people.That's what Shahrukh is...

Saturday, 28 March 2009

तेंदुलकर और मैं


क्रिकेट ज्यादातर हिन्दुस्तानियों के जीवन का अटूट हिस्सा है। इसलिए जब २००७ विश्व कप मैं ब्रियन लारा ने सन्यास की घोषणा करी तो मेरा मन दुखी हो चला। एक एहसास हुआ की एक पीढी बीत गई । मैंने अपने परम मित्र राका को फ़ोन लगाया की "यार हम कितने lucky है की हम को लारा और तेंदुलकर जैसे बल्लेबाजो को खेलते हुए देखने का मौका मिला"। राका ने हु हां करी और मुझे बोला पकाओ मत और फ़ोन काट दिया।

अभी कुछ दिन पहले एक सज्जन मिले और कहने लगे की सचिन एक महान बल्लेबाज नहीं है और द्रविड़, सहवाग कहीं बेहतर है। मैं उनके इस तर्क से बिल्कुल भी सहमत नहीं था, क्योंकि खेल एक मनोरंजन का माध्यम है और पिछले २० साल मैं जितना मनोरंजन हमे सचिन ने दिया है वो और किसी क्रिकेटर ने शायद ही दिया हो।

टीवी देखने मैं मेरा कोई सानी नहीं है। मैं एक दिन मैं बिना ब्रेक लिए घंटो टीवी देख सकता हूँ। 1989  में मैं  नवीं कक्षा में पढ़ रिया था । उन दिनों हमन पंजाब केसरी में पढ़ा की सचिन नाम का एक लड़का क्रिकेट में रिकॉर्ड बना रह हैं, धीरे धीरे सचिन के बारे में समाचारपत्रों में जिक्र बढ़ने लगा । एक ख़बर यह भी आई  की सचिन को carribean  जाने वाली टीम में इसलिए  शामिल नही किया जाएगा, क्योंकि चयनकर्ताओं को डर है की इतना छोटा लड़का तेज गेंदबाजों को नहीं खेल पायेगा।

 सचिन ने इस दौरान बॉम्बे के लिए अपना पहला रणजी मैच खेला और उसमे शतक ठोक दिया। सचिन की प्रतिभा को नज़रंदाज़ करना चयनकर्ताओं के लिए ज्यादा समय तक सम्भव नहीं हो पाया और अंतत पाकिस्तान जाने वाली टीम में शामिल किया गया। उन दिनों टीम के कैप्टेन श्रीकांत जी थे, लेकिन वो टीम बड़ी संतुलित थी खासकर की बल्लेबाजों के मामले में।

हमारे पिताजी भी क्रिकेट के शौकीन थी, और भारत-पाकिस्तान का मैच न देखना तो पाप होता। पहला one day match बारिश के चलते सिर्फ  बीस ओवर का कर दिया गया। मुझे इतना याद है की आखरी पाँच ओवर में भारत को पचास से ज्यादा रन चाहिए थे और भारत के पाँच विकेट गिर गए थे और मैच एक तरह से हारा जा चुका था।
मुश्ताक अहमद  जोकि लेग्स्पिन्नेर था बोलिंग कर रह था और मैदान  पर एक सोलह साल का लड़का बैटिंग करने आया। किसी को एक रती भनक नही थी की क्या होने वाला हैं? सचिन ने शायद उस ओवर में ३ छक्के उडाये। अब्दुल कादिर जोकि उस समय के shane warne हुआ करते थे, मुश्ताक़  के पास गए और बोले  " अभी तुम बच्चे हो, देख में इसे कैसे आउट करता हूँ"। वो कदिर जी की सबसे बड़ी भूल थी, क्योंकि सचिन ने उनको और लंबे छक्के मारे और १७ गेंदों में अपना अर्धशतक पूरा किया, जोकि एक और कीर्तिमान होता, लेकिन वो मैच अधिकारिक रूप से माना  नहीं गया। सचिन भारत को मैच तो नहीं जीता पाया लेकिन उसने क्रिकेट जगत में अपने आगमन का  एलान कर दिया। अगले 23 साल तक इस खिलाड़ी ने हमें ढेर सारे ऐसे क्षण दिए जो कभी भुलाये नहीं जा सकते.

उन अविस्मरनीय क्षणों में हैं, हीरो कप का वो अन्तिम ओवर जब सचिन ने कहा की वो आखरी ओवर करेगा और मक्मिल्लन से उस ओवर में २ रन न बने, और भारत ने अगले मैच में वेस्ट इंदीएस को हरा कर कप जीता। शारजाह में तूफ़ान के बाद की बल्लेबाजी जब सचिन ने ऑस्ट्रलियाई गेंद्बजोंकी जम कर धुनाई करी और भारत को कप जीताया। टेस्ट मैच में मुझे सचिन की पाकिस्तान के ख़िलाफ़ १५५ रनों की पारी हमेशा याद रहती थी। सचिन के  विरुद्ध  कहने वाले कहते हैं की वो मैच जीताने में असफल रहा पर आप कितने ही बड़े खिलाड़ी क्यो ना हो आउट होने के लिए एक ही गेंद काफ़ी होती हैं। सचिन ने नयन मोंगिया के साथ मिलकर वो मैच जीत के करीब तो पहुँचाया परन्तु अजहर एवं द्रविड़ ने तो बिलकुल भी प्रयास नहीं किया। मेरे एक मित्र जो ड्रेसिंग रूम से परिचीत थे उन्होंने बताया की सचिन उस दिन फूट फूट के रोया था।

कौन भूल सकता है, सचिन और shane warne का १९९८ का मुकाबला? उन दिनों में होटल एम्बेसडर बॉम्बे में काम करता था। ऑस्ट्रलियाई टीम का पहला मैच बॉम्बे के विरुद्ध था। होटल के टॉप floor से पूरा स्टेडियम दीखता था। मैं  वहां से खड़ा हो कर मैच देखता रहता था, उस मैच में सचिन ने वार्न की बहुत पिटाई करी और उसे छक्के छक्के उडाये। मेरी फोटो midday अखबार में छपी थी पेज ३ में वो भी with the caption" peeping chef". उस श्रृंखला में अकेले सचिन ने ही ऑस्ट्रेलियाई टीम की धज्जियाँ उड़ा दी थी।


उसके बाद waugh की महान टीम आई अन्तिम किला फतह करने के लिए, यह सही हैं की उस समय भारत एक टीम की तरह खेला और सोरव की कप्तानी बेहतरीन थी। चूँकि मैं उस समय बॉम्बे मैं ही था, मुझे अवसर मिला पहला मैच देखने का, जोकि वानखेडे मैं था। भारत की हालत उस मैच मैं खस्ते हाल ही थी, वो मैच का तीसरा दिन था, और भारत को शायद डेड सौ से ऊपर की लीड थी। भारत के पहले दो विकेट सस्ते मैं निकल गए। सचिन खेलने आया और सारे क्षेत्ररक्षक सीमारेखा पर खड़े हो गए। सचिन ने आनन् फानन मैं ४ चौके जड़ दिए। steve ने गेंद अपने भाई मार्क को दी, सचिन ने एक जोर का शोट मारा, जोकि लंगर के कंधे पर लगा और फिर रिक्की पोंटिंग के हाथों मैं जा गिरा। आधा स्टेडियम खली हो गया और भारत के बचे विकेट ताश के पत्तों की तरह बिखर गए। मुझे  है की बहुत सालों तक भारत की हार जीत पूर्णत सचिन पर ही निर्भर करती थी और सचिन का विकेट मानों भारत की हार।

मेरा ब्लॉग वो सारे क्षणों और घटनायों का वर्णन नहीं कर सकता हैं। लेकिन मैं अपने को बहुत सौभाग्यशाली समझाता हूँ की मुझे सचिन से खिलाड़ी को खेलते देखने का मौका मिला। सचिन ने कभी घमंड नहीं दिखाया न ही वह कभी अपने लिए खेला। अपने पूरे करियर में सचिन पर एक ही बार आरोप लगा (ball tempering ) का वो भी मिथ्या। मैंने टेस्ट मैच का कभी भी बड़ा फेन नहीं रह परन्तु मैंने टेस्ट मैच देखे और सिर्फ सचिन को खेलते देखने के लिए।

सब चीज़ों की तरह सचिन भी अपने चरम को छु चुका हैं पर जो ऊँचाइयों तक वो पहुँचा, वह किसी और के लिए पहुँच पाना शायद सम्भव न हो. सचिन जैसा कोई खिलाड़ी न तो कभी हुआ है और न कभी होगा भले ही Anderson एवं panesar 40 साल के सचिन को लगातार आउट करने में सफल रहे पर मैं   की 30 साल की  में सचिन ने इन गेंदबाजों का क्या हाल बनाया होता।

If cricket was my religion then Sachin was my God! For me cricket will never be same without the master. Long live the legend.

Monday, 23 March 2009

पहाडी समाज 1985-1986


मनुष्य एक सामाजिक पशु है। यह हमारी प्रवृति है की जहाँ हम जाते हैं या रहते हैं हम गुट बनाते है। जैसा की आ अब तक जान चुके है की हम लोग मीरा साहिब शिफ्ट हो चुके थे। चूँकि हमरे पिता जी सरकारी कर्मचारी थे उनका तबादला होता रहता थे। उनके ऑफिस में   काफी सारे पहाडी भी काम करते थे। मेरे ख़याल मैं बिष्ट अंकल और अमोली अंकल के दिमाग मैं यह बात आयी की क्यों न एक संगठन बना जाए और उसमे जम्मू में  रहने वाले सारे कुमोनी और गढ़वाली लोगो को शामिल करा जाए। तो इस तरह से जम्मू में  पहाडी समाज की नींव पड़ी।

उस समय मेरी उमर १० साल की थी और मुझे ऐसा लगता है की हम बच्चों के लिए पहाडी  समाज एक तरह से वरदान साबित हुआ। पहाडी   समाज का फैलाव binary fission की तरह हुआ, बिष्ट अंकल के जानने वाले और फिर उन जानने वालो के जानने वाले सब इसमे शामिल होते गए और धीरे धीरे लगभग ३० के आसपास सदस्य हो गए। जब इतने सारे सदस्य हो गए तो एक कार्यकारी समिति बनाई गयी, जिसका काम था सांस्कृतिक और मनोरंजक कार्यक्रमों का आयोजन। उसके बाद दो तीन ऐसे घटनायें  घटी जोकि मेरे मानस पटल में  हमेशा हमेशा के लिए अंकित हो गयी। काफी विचार विमर्श के बाद समिति ने निर्णय लिया की सारे सदस्य लोग पिकनिक मनाने मानसर झील जायेंगे।

किस्सा मानसर झील का
तो भाई, दो बसें भर भर कर गाँधी नगर से मानसर के लिए चल पड़ी। हम लोग भी सपरिवार इस यात्रा में  शामिल हो गए। बसों में गाने बजाने का भी पूरा आयोजन था, ढोलक और हारमोनियम दोनों ही उप्लभद  थे। हमारे पापा को गाना गाने का शौक था और पहाडी संगीत के अच्छे ज्ञाता भी थे। इस तरह हम अपने लोक संगीत के आनंद लेते हुए एक घंटे के अन्तराल मैं अपने गंतव्य पर पहुँच गए। 



मानसर एक छोटी सी झील है और उसके आसपास पिकनिक मनाने के लिए पार्क, बेंचेस आदि सब की सुविधा है। मानसर पहुँच के पहले तो सब लोगो को झील के चारो और चक्कर लगना होता है, यह एक तरह का दस्तूर सा हैं। तो वहां पहुंचते ही सब के दल बन गए, हमारी उमर के सारे लौंडे लाफादे भइया लोगो के साथ हो लिए। मम्मी लोग सारे आंटी लोगो के दल में  शामिल हो गए, सारी दीदियाँ एक तरफ़ हो ली और पापा लोग अपनी मस्ती में  मशगूल हो गए। जब झील का चक्कर लग गया तो हम सारे बच्चे गुड्डू भइया के मार्गदर्शन मैं निकल पड़े। गुड्डू भइया हमे सीडियों के पास लिए और वो सीडियां झील के पानी तक जाती थी। क्योंकि मानसर में  मछली   मारना मना है इसलिए वहां पर ढेर साडी मछलियाँ  थी।





तो हम गुड्डू भइया की अगवाई में  आगे चलते गए, क्योंकि वही सीडियों के आसपास काफी साडी मछली तैर रही थी इसलिए हम पानी में  हाथ डाल  कर उन्हें पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। मैंने अपने दिमाग पर जोर डाला और मैं एक प्लास्टिक बैग का जुगाड़ कर लाया। और उसको पानी में  डाल कर मछलियों को पकड़ने की कोशिश करने लगा। ढेर सारी  मछलियाँ देख कर मुझे जोश आ गया और मैंने ज़ोर से मछलियों की तरफ़ बैग डाला, मेरा पैर फिसला और मैं पानी मैं अन्दर जा गिरा और गहरे पानी मैं जा पहुँचा, क्योंकि मुझे तैरना आता था और मैं ज्यादा दूर नहीं गया था। मैं तैर करके किनारे आ गया। लेकिन तब तक सोनू दौड़ कर मेरी मम्मी के पास पहुँच गया था और आंखों देखा हाल प्रसारित कर चुका था। 



मुझे आभास सा तो गया था की अब होगी सुताई वो भी जम कर। मेरे कपड़े सारे भीग चुके थे और कपडों से एक दो मछलियाँ भी गिर पड़ी। जहाँ मैं पहुँचा था वहां एक कछुआ भी था जो पानी मैं मेरी उपस्थिति होते ही भाग खडा हुआ था, पर सोनू उर्फ़ महाभारत के संजय ने वह कह था की कछुआ मेरी टांग खीचने  वाला था। मम्मी गभराई   सी मुझे खोजती हुई आयी, मुझे सुरक्षित पा कर रहत की साँस ली। फिर हमको हमारे पिताजी के सामने प्रस्तुत किया गया और हमारे कारनामे का विस्तार पूर्वक विवरण दिया। मैं पानी से तर बतर था मुझे ठण्ड न लगे और मुझे एक सबक मिले, मुझे निर्वस्त्र होने का आदेश सुनाया गया। मैं वैसे तो पानी पानी था ही यह फरमान सुनते ही और पानी पानी हो गया, वहां मेरी उमर की कन्याएं मोजूद थी और पापा मुझे कपडे उतराने को कह रहे थे। मरता क्या न करता, अगर मना करता तो वही सब के सामने मेरी जय राम जी की हो जाती। अच्छा हुआ की मैंने उस दिन सिर्फ़ निक्कर ही नहीं पहनी थी , मेरे तन पर सिर्फ़ मेरी लंगोट रह गयी। सब लोग मस्त हो गयी किसी को मेरी व्यथा न समाज मैं आयी। सब लोग जानते तो थे की मैं उज्जड हूँ उस दिन यह प्रमाणित भी हो गया।

Sunday, 8 February 2009

Main aur Raka, Mukteshwar Trip March 1997






This is the time, when we were in the Final year of our Diploma in Hotel Management, Lucknow. 1997 was not the best of the year for the jobs and recruitment. Indian economy has just started to open up and in the hospitality sector there were only few major players like TAJ HOTELS, OBEROI HOTELS, SHERATON etc.



Me and my best friend Raka ( real name Rakesh Tewari) were trying hard to get a decent job. As I said that this was our Final year so it was essential for us to get a job before we pass out from the college.

At that time success depended quite a lot on PAWUA , which meant one will only get the job, If they knew someone powerful. Hence it was quite clear that both of us failed to land up any jobs during campus selection. We had to do something and being more serious about life, I started the job hunt. Raka's phillisophy of life was LAISSEZ FAIRE, in simpler words his only motto was , JO HOGA ACCHA HOGA, SAB HO JAYEGA.






I was looking for the jobs in the caterer magazine and my eyes got stuck upon an Ad which said

MANAGERS WANTED FOR A RESORT, MOUNTAIN TRAIL, MUKTESHWAR. This was a small 15 villas property in the beautiful, picturesque destination in the hills of Himalayas. I got quite interested in it and applied for it. To my surprise I got a prompt call from the MD of the company.The Head Office was in Pahadganj, New Delhi, so I went to Delhi by Lucknow mail for my interview. My interview went well and they were impressed with all the BOL BACHAN I gave to them, as that was one of the few things, you get taught well in IHMs. So the proposal was made and because they were looking for 2 managers, I forwarded the name of my dearest friend Raka. The offer made to us was subject to the condition that we must visit the property, stay there, check out the place and then make up our mind.

serpent way to mukteshwar




I came back to Lucknow, this time by PRAYAGRAJ express, sitting in the military compartment as rest of the train was packed and there was no other place to go. Prayagraj only came till kanpur so I took PUSHPAK exp from there after waiting for nearly four hours in harsh winter at railway platform. When I reached Lucknow, I told Raka about the offer, he was upto it. So we decided that we will check the place out and will enjoy the free stay.
There was a problem as we both were kadke(penniless), we had to think of the cheapest way to travel to Mukteshwar. My PHOOPHA JI used to teach at Birla Public School in Naintal and they used to come to Lucknow every year during winter holidays. This looked like an answer to our probelm and I asked Bua if me and Raka can come along to Haldwani with them in their Jeep.






This was a memorable trip and one of the memories from my RAM ( random access memory).



It was a night journey and it included me, Raka, Prem uncle, Bua, Bhaiyu and Shweta. Bhaiyu once owned the crown for being the naughtiest kid in our clan and those were his haydays. We started from Lucknow and we made a stop at Sitapur for some refreshments. In the whole journey Bhaiyu was a constant thorn in the flesh, annoying both of us with his antics. Next morning we reached Haldwani and we took a bus from there to Mukteshwar.

The journey to mukteshwar breaks at Bhowali, its a small hamlet known to all paharis as all the routes go from there and the place is famous for its aloo gutke, which is nothing but aloo jeera made in pahadi ishtyle.










So, we took a halt there did some pet pooja and took another state roadways bus to MUKTESHWAR... we reached there around 2 pm in the afternoon and it was really cold out there. The resort looked beautiful, nicely done small rooms, a restaurant, decent kitchen and there was a fantastic library. It seemed that owner was a very knowledgable and thorough person. We checked into our room and it was chilled like a walk in fridge, the temperature must have been around 1C.

Hotel had fruit orchard at back and the landscaping was done in a very tasteful manner, sadly becoz of being kadka, we never had a decent camera thats one thing I rue the most. We took a walk around the area, It was very serene, calm and peaceful. By the time we came back it was supper time, chef had made us mutton curry and naan which was tasting like manna at that time. It was hot in temperature and rightly spiced. After that we went to sleep.

I woke up at the middle of night as It had become very cold, my rajai had gone cold and I tried to go to लघुशंका and as soon as i put my chappals, i got a shock as even they felt like cold ice. I looked into the room and there was a small blower heater there. So I put that blower inside the रजाई and managed to sleep out the rest of the night. Raka as usual was pretty unaffected with the whole thing.

When we woke up next morning and rays of morning sun were coming to our room thru the window. I came out of the room and that was one of the best mornings I have ever experienced in my life. The winter sun was there at the horizon coming out and lighting up the hills of HIMALAYAS, the red, yellow and violet flowers were blossoming in the front gardens, the chirping of the birds could be heard in the background. And then I looked at the front and there were snow clad mountains reflecting the sunlight, the whole experience was unbelievable. I had never even thought that cap of the mountains will be so high, here I would like to tell people that Himalayan mountains are the tallest in the world, to give an idea to European readers- Mt Blanc is around 5000 ft whereas Mt everest is 9000.

Raka was also woke up in the meanwhile and we both were in the awe of the beauty of the nature. I had never felt the nature so closely before.

If you live close to kumaon hills or if you love hill stations and then I recommend that one must go to Mukteshwar and experience the nature in its purest form.


















Monday, 2 February 2009

Memoirs of Childhood ( Baal Smriti )



Lets start with your First Day of the Life. As humans we can't remember our early years. Brain does not start keeping memories till, we have past the age ofthree years approx. Meri life ka pehla din yaad karoo तो, I see my mother, father and sister are standing outside military quarters with other families in Prem Nagar, Dehradun and watching the snows on the mountains of Mussorie. That scene is in my RAM( random access memory).


Once someone told me that I dwell too much in the past. I dont see anything wrong in it. In my viewpoint thats what life is, isnt it? Every individual's life is a story, some forms an interesting one eg. Sachin Tendulkar and some boring eg. Gaurav Pandey or maybe not...


Other thing I do besides dwelling in the past, is trivial matters. I think about weird things. My close friends call me CHARASI which in laknawi slang means a Wierdo or a nagger or someone not normal. Since my school days I tried my best to avoid bhedchal but I did not have the talent to pursue it for long. Thats why i became a commoner.

In the early childhood, I was always impressed by my elder brother....., kind of idolised him. He did not grew with me and my sister. He always lived with our nani. We only used to see him during our holidays.

When I was 4 and he was 10, our father took us to a
Dusshera mela and there he bought us teer kaman. We used to have a doll in our house, we used that doll as target practice and tore it apart.

He used to read lots of comics
Madhu Muskan, Lotpot, Chandamama and Nandan. Diamond comics came later on and became very popular. So to follow him , even we( me and my sis) started to like comics.My favourite was chandamama as it used to have stories about ancient Indian Kings told in simple and precise words.I like Madhu Muskan as well, in that there used to be a comic series DAKU PAAN SINGH AND SUPARI.

We used to have a cat, her name was
लछुली, my father gave that name to her. Once when we had gone to Haridwar, she got eaten by dogs. My first school was नन्ही दुनिया, which everyone called as नंगी दुनिया . There was a big ground between my school and our house. And it always semed big to me as when you are young distances do look bigger.

Once I got injured running after a military truck( I dont know , Why I was doing that?) and i think that my mother first slapped me for running behind it and then she took me to hospital .


..... My first movie in the PICTURE HALL was KALA PATHAR, I hardly understood anything, All i remember is that I was fighting with the kids of my age by shouting AA
AMITA BACCHAN.. AMITA BACCHAN....A BISHHUUM AAA BSSSHUUM. We lived in Dehradun for a year and then my father got transfered to Jammu. I also remember that My sister used to go to GURU NANAK SCHOOL and once I went with her to Bazzar to buy some sticks for Dandiya.

I started going to school in Jammu, My first proper school was लूथरा अकेडमी, which was popularly known as लूटेरा अकेडमी, I do not have lots of memories from there, I only remember that I used to go to school in the protection of my sister and my class teacher was Champa Madam.She was strange, she used to send her pupils to fetch samosas?????????? from the halwai shops during school hours. I also remember Morning assemblies and asking teacher-.... MISS, CAN I GO TO TOILET PLEASE. and after that MAY I COME IN PLEASE.

After that, My father got me enrolled in Kendriya Vidyalaya at Mira Sahib. We( me and another 2 boys rahul and anoop) used to take bus from Gandhi Nagar to Mira Sahib. I dont know,How my mother let me travel for such distance alone in those private buses.One day I came back from school to our Gandhi Nagar house and our landlady said that everyone has shifted to Mira Sahib. It was really a nice house with garden and lots of playing spaces. to be contiued.......

Zurich Trip Jan 2009





spring water coming out from a statue with running taps








Its like a dream coming true, even saying that can not match the excitement of being here.
I grew up in a middle class family and our yearly travel was mostly limited to the Northern parts of India. I was always interested in travelling and seeing places, as my elder brother says " iske pair main chakkar hain". In Zurich they have done the fantastic job of keeping the cultural heritage with modernity, as at the High Street, one one hand you will see all the modern stores and malls. On the other side, there are Roman style of buildings, statues and streets.


Zurich is the most populated city in Switzerland and even then it looks sparsely populated. Everything is in order, the trains run on time so do buses and trams. This is the country where they make best watches.








Here, One thing I must say that Zurich is an expensive place to visit as its one of the most visited places in the world. Tourism is the back bone of the Swiss economy.

Its a country of lakes and Zurich is also situated on the bank of Zurich lake and surrounded by small mountains. We decided to explore Uttliberg, there is train service to Uttliberg and it virtually goes up the hill in a perpendicular fashion. As, it was the month of January, Uttliberg was covered in the snow.

WELCOME

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Thanks